पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज (Premanand Ji Maharaj)

परिचय

आज के समय में जब संसार भागदौड़, प्रतिस्पर्धा और मानसिक अशांति से घिरा हुआ है, वृंदावन की पावन भूमि से एक ऐसी वाणी उठती है जो करोड़ों हृदयों को शांति देती है — पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) की वाणी। उनका जीवन स्वयं में एक उपदेश है — त्याग, तपस्या, अनन्य राधा-भक्ति और असीम करुणा का जीवंत उदाहरण। वे न कोई चमत्कार दिखाते हैं, न कोई बड़ा दावा करते हैं। वे केवल “राधा नाम” का आश्रय बताते हैं, और उसी सरलता में उनकी सबसे बड़ी शक्ति निहित है।


जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

पूज्य महाराज जी का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल ब्लॉक में स्थित अखरी गाँव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। बाल्यकाल में उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पाण्डेय रखा गया। उनके पिता का नाम श्री शम्भू कुमार पाण्डेय और माता का नाम रमा देवी था। कुछ स्रोतों के अनुसार उनका जन्म वर्ष 1969 बताया जाता है, यद्यपि इस विषय में कोई आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है — और स्वयं महाराज जी ने कभी अपनी जन्मतिथि या व्यक्तिगत विवरणों को महत्व नहीं दिया।

परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था। खेती-किसानी पर निर्भर इस परिवार की वास्तविक सम्पत्ति उसका धार्मिक संस्कार था। उनके पिता और दादाजी भी वैराग्य-भाव से जुड़े रहे, और घर का वातावरण आरंभ से ही भजन, पूजा और शास्त्र-पाठ से भरा हुआ था। उनके बड़े भाई संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे।


बाल्यकाल — भक्ति के प्रारंभिक अंकुर

महाराज जी का झुकाव अत्यंत कम आयु में ही धर्म और अध्यात्म की ओर हो गया था। जिस आयु में बालक खेल-कूद में रुचि रखते हैं, उस आयु में वे बड़े भाई के साथ बैठकर श्रीमद्भागवत का पाठ करने लगे। हनुमान चालीसा का वे असंख्य बार पाठ कर लेते थे। गीता के श्लोक, स्तोत्र और भजन उन्हें सहज ही कंठस्थ हो जाते थे।

धीरे-धीरे उनके मन में यह प्रश्न गहराने लगा — “यह संसार क्या है? मैं कौन हूँ? जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?” यह जिज्ञासा इतनी प्रबल हुई कि मात्र तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने पहली दीक्षा ग्रहण कर ली और गृहस्थ जीवन का मोह त्यागकर साधना के मार्ग पर निकल पड़े।

भक्तों में यह प्रसंग बड़े भाव से सुनाया जाता है कि घर छोड़ते समय उन्होंने माता से अंतिम बार भोजन माँगा, और फिर वापस मुड़कर नहीं देखा। तेरह वर्ष का एक बालक, बिना धन के, बिना किसी आश्रय के, अकेले ईश्वर की खोज में निकल पड़ा — यह साधारण घटना नहीं थी।


वाराणसी की कठोर तपस्या

Varanasi Tulsi Ghat

गृहत्याग के बाद वे वाराणसी पहुँचे। यहाँ का जीवन अत्यंत कठोर था। वे तुलसी घाट और गंगा के किनारे रहते थे। प्रतिदिन तीन बार गंगा स्नान करते। न कोई निश्चित आश्रय, न भोजन की व्यवस्था, न कोई सहारा।

संन्यासी जीवन के आरंभिक दिनों में वे कई-कई दिनों तक भूखे रहे। उन्होंने किसी से माँगने की वृत्ति नहीं अपनाई — जो स्वयं मिल जाए, ग्रहण कर लिया; न मिले तो जल पीकर भजन करते रहे। सर्दी की रातें खुले आकाश के नीचे बीतीं, वर्षा में भीगते रहे, ग्रीष्म की तपती दोपहरी में भी साधना नहीं छोड़ी।

इसी काल में उन्होंने संन्यास की औपचारिक दीक्षा ली और आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी तथा आगे चलकर स्वामी आनंदाश्रम के रूप में जाने गए। वेदांत, उपनिषद और अद्वैत साधना का गहन अध्ययन और अभ्यास इसी अवधि में हुआ। पीले वस्त्र धारण करने के कारण लोग उन्हें स्नेह से “पीले बाबा” भी कहने लगे।

बनारस के अतिरिक्त हरिद्वार, नंदेश्वर धाम और अनेक तीर्थस्थलों पर उन्होंने तप किया। यह अवधि उनके जीवन की नींव थी — यहीं उन्होंने शरीर, इंद्रिय और मन पर वह अधिकार प्राप्त किया जो आगे चलकर उनकी वाणी में अधिकार बनकर प्रकट हुआ।


जीवन का निर्णायक मोड़ — अद्वैत से भक्ति की ओर

वर्षों की अद्वैत-साधना के बाद उनके जीवन में एक ऐसा क्षण आया जिसने दिशा ही बदल दी। उनका परिचय ब्रज की रासलीला से हुआ। श्री राधा-कृष्ण की दिव्य लीला के उस दर्शन ने उनके हृदय को भीतर तक भिगो दिया।

यह प्रभाव इतना गहरा था कि उन्होंने निराकार-अद्वैत संन्यास का मार्ग छोड़कर भक्ति का रसमय मार्ग चुन लिया। कहा जाता है कि रासलीला के बिना वे एक क्षण भी नहीं रह पाते थे। यह किसी साधारण साधक के लिए सरल निर्णय नहीं था — वर्षों की तपस्या से अर्जित एक स्थापित पहचान को छोड़कर, नए सिरे से एक दास बनकर भक्ति के द्वार पर खड़े हो जाना अत्यंत दुर्लभ त्याग है।

इसके पश्चात वे वृंदावन आ गए, और यहीं के होकर रह गए।


वृंदावन और राधावल्लभ परंपरा

shri radha vallabh mandir

वृंदावन में उन्हें लगभग तीन दशक हो चुके हैं। यहाँ आकर वे श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित राधावल्लभ संप्रदाय से जुड़े। इस परंपरा में श्री राधा रानी को परमेश्वरी माना जाता है और श्री कृष्ण को उनके प्रियतम के रूप में; सखी-भाव और रसिक उपासना इस संप्रदाय की विशेषता है।

आरंभ से ही उन्होंने केवल “राधा नाम” का भजन किया। बाल्यावस्था से ही ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वे पूर्ण रूप से राधा नाम की भक्ति में लीन हो गए। इसी परंपरा में उन्हें “श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण” (Premanand Ji Maharaj) नाम प्राप्त हुआ — यही नाम आज विश्वभर में श्रद्धा के साथ लिया जाता है।

गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति उनकी निष्ठा आज भी उतनी ही दृढ़ है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर वे अपने गुरु श्री हित गौरांगी शरण महाराज जी की पूजा करने यमुना विहार कुंज आश्रम पहुँचते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु गुलाब की पंखुड़ियों से मार्ग सजाकर उनका स्वागत करते हैं और समूचा वृंदावन “राधे-राधे” से गूँज उठता है। जो स्वयं लाखों के गुरु हैं, वे अपने गुरु के चरणों में उसी विनम्रता से झुकते हैं — यही उनकी सबसे बड़ी शिक्षा है।


आश्रम — श्री हित राधा केलि कुंज

shri hit radha keli kunj ashram

महाराज जी वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) के रमण रेती क्षेत्र में स्थित अपने आश्रम “श्री हित राधा केलि कुंज” ( Shri Hit Radha Keli Kunj Ashram ) में निवास करते हैं। यह आश्रम आज देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन चुका है।

आश्रम का वातावरण

आश्रम में किसी प्रकार की भव्यता या आडंबर नहीं है। सादगी ही यहाँ की पहचान है। परिसर में प्रवेश करते ही निरंतर “राधे-राधे” का संकीर्तन सुनाई देता है। यहाँ न कोई विशेष पंक्ति है, न पद-प्रतिष्ठा का भेद — जो पहले आता है, वह आगे बैठता है।

दैनिक दिनचर्या

आश्रम की दिनचर्या ब्रह्ममुहूर्त से आरंभ होती है:

  • प्रातः लगभग 4:00 – 5:00 बजे — पदयात्रा: महाराज जी परिक्रमा मार्ग पर पदयात्रा करते रहे हैं, जिसमें भक्त भजन गाते और राधा-कृष्ण का नाम संकीर्तन करते हुए साथ चलते हैं। हज़ारों लोग इस पदयात्रा में दर्शन के लिए रात्रि से ही प्रतीक्षा करते रहे हैं।
  • प्रातः लगभग 5:00 – 6:00 बजे — प्रवचन: पदयात्रा के बाद सत्संग होता है, जिसमें भजन, कथा और राधा-कृष्ण की भक्ति पर उपदेश सम्मिलित रहते हैं।
  • एकांतिक वार्तालाप: सत्संग के बाद भक्तगण अपने व्यक्तिगत और जीवन से जुड़े प्रश्न पूछते हैं, जिनका उत्तर महाराज जी अत्यंत सरलता और शांति के साथ देते हैं। यही वार्तालाप सोशल मीडिया पर सर्वाधिक लोकप्रिय हुए हैं।

एकादशी, जन्माष्टमी, राधाष्टमी और कार्तिक मास में कार्यक्रम विस्तृत हो जाते हैं और आश्रम में विशेष उत्सव का वातावरण बनता है।

यह ध्यान रखने योग्य है कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से समय-समय पर इस दिनचर्या में परिवर्तन होते रहे हैं। मई 2026 में उनकी प्रतिदिन की पदयात्रा स्वास्थ्य कारणों से अनिश्चितकाल के लिए स्थगित की गई। आश्रम प्रशासन तथा मथुरा पुलिस ने पुष्टि की कि वे स्थिर हैं और अपना नित्य सत्संग व दिनचर्या जारी रखे हुए हैं, साथ ही श्रद्धालुओं से अनुरोध किया गया कि अपुष्ट बातों को न फैलाया जाए। दर्शन और एकांतिक वार्तालाप की व्यवस्था में भी समय-समय पर परिवर्तन होते रहते हैं, अतः दर्शनार्थियों को आश्रम की आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करना चाहिए।


स्वास्थ्य — आस्था की अग्निपरीक्षा

पूज्य महाराज जी लगभग अठारह से बीस वर्षों से ऑटोसोमल डोमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिज़ीज़ (ADPKD) नामक गंभीर रोग के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस रोग के कारण उनकी दोनों किडनियाँ कार्य करना बंद कर चुकी हैं और उन्हें नियमित डायलिसिस पर रहना पड़ता है।

सबसे हृदयस्पर्शी बात यह है कि अनेक भक्तों ने किडनी दान करने की पेशकश की, परंतु महाराज जी ने उन सभी प्रस्तावों को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपनी दोनों किडनियों को राधा” और “कृष्ण नाम दिया है, और कहते हैं कि जब तक श्रीजी (राधा रानी) चाहेंगी, उनकी साँसें चलती रहेंगी।

शरीर की इतनी पीड़ा के बीच भी वे प्रतिदिन पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ करते हैं, सत्संग देते हैं और भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं। जो व्यक्ति स्वयं इतनी वेदना में हो और फिर भी दूसरों के दुःख सुनकर उन्हें सांत्वना दे — यह सामान्य मनुष्य का सामर्थ्य नहीं है। उनकी यह अटूट आस्था और धैर्य ही उनके प्रति देशभर के अपार सम्मान का कारण है।


आध्यात्मिक शिक्षाएँ

1. राधा नाम की महिमा

उनकी समस्त साधना और उपदेश का केंद्रबिंदु श्री राधा नाम का जप है। वे बताते हैं कि नाम-जप में कोई नियम, कोई योग्यता, कोई जाति-भेद या शुद्धि-अशुद्धि का बंधन नहीं है। कोई भी व्यक्ति, किसी भी अवस्था में, कहीं भी नाम ले सकता है। उनके अनुसार नाम ही इस कलिकाल में सबसे सुलभ और सबसे शक्तिशाली साधन है।

2. बाह्य आडंबर से अधिक आंतरिक साधना

महाराज जी का दर्शन सादगी, भक्ति और आंतरिक ध्यान पर आधारित है। वे बाहरी अनुष्ठानों, दिखावे और कर्मकांड की जटिलता की अपेक्षा भीतर की साधना पर ज़ोर देते हैं। उनका कहना है कि माला बाहर घूमे और मन संसार में भटकता रहे, तो वह जप नहीं है।

3. गृहस्थ जीवन भी साधना है

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे संन्यास को एकमात्र मार्ग नहीं बताते। माता-पिता की सेवा, कर्तव्य-पालन, ईमानदारी से आजीविका, पत्नी और संतान के प्रति निष्ठा — इन सबको वे भक्ति का ही अंग मानते हैं। वे कहते हैं कि घर छोड़कर भागना साधना नहीं; अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भगवान का स्मरण करना ही वास्तविक साधना है।

4. कर्म में निष्ठा और स्मरण

जो लोग उनसे अपने कार्यक्षेत्र में सफलता का मार्ग पूछते हैं, उन्हें वे सरल उत्तर देते हैं — अपने कार्य को ही अपनी साधना मानो, अभ्यास में कोई कोताही मत करो, और बीच-बीच में भगवान का स्मरण करते रहो। कर्म और भक्ति को वे परस्पर विरोधी नहीं, पूरक मानते हैं।

5. व्यावहारिक जीवन-समाधान

उनके सत्संग की सबसे बड़ी लोकप्रियता इसी कारण है कि वे केवल शास्त्र की बात नहीं करते। अवसाद, परीक्षा का तनाव, वैवाहिक कलह, व्यवसाय की चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, अकेलापन, संतान का मोह — इन सब पर उनके उत्तर व्यावहारिक भी होते हैं और शास्त्रसम्मत भी। वे किसी को डाँटते नहीं, किसी को छोटा नहीं समझते।

6. सहनशीलता और स्वीकार्यता

अपने ही जीवन के माध्यम से वे यह सिखाते हैं कि दुःख से भागना नहीं, उसे प्रभु की व्यवस्था मानकर स्वीकार करना चाहिए। वे कहते हैं कि जो होना है वह होकर रहेगा — हमारा काम केवल भजन करते रहना है।

7. सभी के लिए खुला द्वार

भक्तों के अनुसार महाराज जी का दरबार सभी के लिए खुला है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, पद या प्रतिष्ठा का कोई भेदभाव वहाँ नहीं है। हर आगंतुक को वही स्नेह, वही आशीर्वाद प्राप्त होता है।

8. सत्य और मर्यादा

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि धार्मिक विषय गहरी भावना के विषय हैं, और उनका उपहास करना अथवा उनके विषय में असत्य फैलाना पाप है। वे भक्तों को भी सदैव सत्य, संयम और मर्यादा का पालन करने का उपदेश देते हैं।


सोशल मीडिया और वैश्विक प्रभाव

महाराज जी ने कभी प्रचार नहीं चाहा, परंतु उनके सत्संगों के वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से फैले और देश-विदेश तक पहुँचे। महाराज जी और भक्तों के बीच हुए वार्तालाप वायरल होने से उनकी ख्याति भारत के बाहर भी पहुँची।

आज यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य माध्यमों पर उनके प्रवचन करोड़ों बार देखे जाते हैं। विशेष रूप से युवा वर्ग, जो पहले अध्यात्म से दूर था, उनकी सीधी और बिना लाग-लपेट की बातों से जुड़ा है। अनेक लोगों ने उनके सत्संग सुनकर नशा, क्रोध और नकारात्मक आदतों को त्यागा है — यह उनके उपदेश का सबसे बड़ा प्रमाण है।


प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का आगमन

पूज्य महाराज जी के सत्संग की सरलता और गहराई ने समाज के हर वर्ग को आकर्षित किया है। खेल, फ़िल्म, उद्योग, साहित्य और राजनीति — अनेक क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियाँ समय-समय पर राधा केलि कुंज आश्रम पहुँचकर दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करती रही हैं। कथावाचक और संत-समाज के अनेक गणमान्य व्यक्ति भी उनसे भेंट कर चुके हैं।

परंतु यहाँ एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है — महाराज जी स्वयं किसी की प्रसिद्धि, पद या सम्पन्नता को कोई महत्व नहीं देते। उनके लिए आश्रम में आया प्रत्येक व्यक्ति समान है। सबसे आगे वही साधारण भक्त बैठता है जो घंटों प्रतीक्षा करके आया है। यही समदृष्टि उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है और यही कारण है कि साधारण जन उनसे सबसे अधिक जुड़ाव अनुभव करते हैं।


निष्कर्ष

पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति में कोई दिखावा नहीं होता। तेरह वर्ष की आयु में गृहत्याग, गंगा तट पर वर्षों की कठोर तपस्या, अद्वैत से भक्ति की ओर का साहसिक मोड़, और फिर वृंदावन की रज में समर्पित तीन दशक — यह यात्रा अपने आप में एक ग्रंथ है।

शरीर की पीड़ा के बीच भी उनका मुखमंडल प्रसन्न रहता है, वाणी में करुणा रहती है और उपदेश में सरलता। वे न धन माँगते हैं, न अनुयायी बनाते हैं, न कोई दावा करते हैं। वे केवल एक बात कहते हैं — “राधा नाम लो, सब ठीक हो जाएगा।”

और शायद यही कारण है कि आज करोड़ों लोग उनमें अपने जीवन का सहारा देखते हैं।

जय श्री राधे 🙏

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