Durga Kavach

Durga Kavach

 देवी दुर्गा कवच का पाठ

॥ अथ देव्याः कवचम् ॥

विनियोग

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः।
अनुष्टुप् छन्दः। चामुण्डा देवता।
अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्। दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्।
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥

हिन्दी अर्थ:
इस श्रीचण्डी कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवी चामुण्डा इसकी अधिष्ठात्री देवता हैं। अंगन्यास में वर्णित मातृशक्तियाँ इसका बीज हैं तथा दिक्-बन्ध की देवताएँ इसका तत्त्व हैं। श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसका जप किया जाता है।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

मार्कण्डेय उवाच।

१.
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥

हिन्दी अर्थ:
मार्कण्डेय जी ने कहा— हे पितामह ब्रह्माजी! संसार में जो अत्यन्त गुप्त और मनुष्यों की सर्व प्रकार से रक्षा करने वाला उपाय है, जो किसी को नहीं बताया गया, वह मुझे बताइए।

ब्रह्मोवाच।

२.
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥

हिन्दी अर्थ:
ब्रह्माजी बोले— हे विप्र! ऐसा अत्यन्त गुप्त और सभी प्राणियों के लिए कल्याणकारी देवी का पवित्र कवच है। हे महामुनि, उसे सुनो।

३.
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥

हिन्दी अर्थ:
देवी के प्रथम स्वरूप का नाम शैलपुत्री, दूसरे का ब्रह्मचारिणी, तीसरे का चन्द्रघण्टा और चौथे का कूष्माण्डा है।

४.
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥

हिन्दी अर्थ:
पाँचवाँ स्वरूप स्कन्दमाता, छठा कात्यायनी, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ महागौरी कहलाता है।

५.
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥

हिन्दी अर्थ:
नवाँ स्वरूप सिद्धिदात्री है। इस प्रकार ये नौ दुर्गाएँ कही गई हैं। इन नामों का वर्णन स्वयं महान ब्रह्माजी ने किया है।

६.
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्त्ताः शरणं गताः॥

हिन्दी अर्थ:
जो मनुष्य अग्नि से घिरा हो, युद्ध में शत्रुओं के बीच फँस गया हो, कठिन अथवा दुर्गम स्थान में हो या भय से पीड़ित होकर देवी की शरण में आया हो—

७.
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥

हिन्दी अर्थ:
उसके लिए युद्ध या संकट में कोई अशुभ नहीं होता। उसके सामने आपत्ति, शोक, दुःख अथवा भय नहीं टिकता।

८.
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥

हिन्दी अर्थ:
जो भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण करते हैं, उनकी उन्नति होती है। हे देवेश्वरी! जो आपका स्मरण करते हैं, उनकी आप रक्षा करती हैं— इसमें कोई संदेह नहीं।

मातृशक्तियों का वर्णन

९.
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥

हिन्दी अर्थ:
चामुण्डा देवी प्रेत पर विराजमान हैं, वाराही महिष पर, ऐन्द्री हाथी पर और वैष्णवी गरुड़ पर विराजमान हैं।

१०.
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥

हिन्दी अर्थ:
माहेश्वरी वृषभ पर और कौमारी मयूर पर विराजमान हैं। देवी लक्ष्मी कमलासन पर बैठी हैं, उनके हाथ में कमल है और वे भगवान हरि को प्रिय हैं।

११.
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥

हिन्दी अर्थ:
श्वेत स्वरूप धारण करने वाली ईश्वरी वृषभ पर सवार हैं। ब्राह्मी हंस पर आरूढ़ हैं और सभी आभूषणों से सुशोभित हैं।

१२.
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥

हिन्दी अर्थ:
ये सभी मातृशक्तियाँ दिव्य योगशक्तियों से सम्पन्न हैं तथा विभिन्न आभूषणों और अनेक प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं।

१३.
दृश्यन्ते रथारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥

हिन्दी अर्थ:
ये देवियाँ रथों पर आरूढ़ होकर, अधर्म और दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए क्रोध से परिपूर्ण दिखाई देती हैं। वे शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल जैसे अस्त्र धारण करती हैं।

१४.
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥

हिन्दी अर्थ:
वे ढाल, तोमर, फरसा, पाश, भाला, त्रिशूल और श्रेष्ठ शार्ङ्ग धनुष आदि अस्त्र धारण करती हैं।

१५.
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥

हिन्दी अर्थ:
वे दैत्यों के विनाश, भक्तों को निर्भय करने और देवताओं के कल्याण के लिए इन अस्त्रों को धारण करती हैं।

दिशाओं की रक्षा

१६.
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥

हिन्दी अर्थ:
हे अत्यन्त उग्र स्वरूप वाली देवी! आपको नमस्कार है। हे महान पराक्रम वाली, महान शक्ति और उत्साह से सम्पन्न तथा महान भय का नाश करने वाली माता, आपको प्रणाम।

१७.
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्द्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥

हिन्दी अर्थ:
हे देवी! जिनका दर्शन दुष्टों के लिए कठिन है और जो शत्रुओं के भय को बढ़ाने वाली हैं, मेरी रक्षा करें। पूर्व दिशा में ऐन्द्री और आग्नेय दिशा में अग्निदेवता मेरी रक्षा करें।

१८.
दक्षिणेऽवतु वाराही नैरृत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी॥

हिन्दी अर्थ:
दक्षिण दिशा में वाराही, नैऋत्य दिशा में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी और वायव्य दिशा में मृग पर सवार देवी मेरी रक्षा करें।

१९.
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा॥

हिन्दी अर्थ:
उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान दिशा में शूलधारिणी मेरी रक्षा करें। ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी मेरी रक्षा करें।

२०.
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥

हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार शव पर आरूढ़ चामुण्डा मेरी दसों दिशाओं से रक्षा करें। सामने जया और पीछे विजया मेरी रक्षा करें।

२१.
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥

हिन्दी अर्थ:
बाईं ओर अजिता और दाईं ओर अपराजिता मेरी रक्षा करें। सिर की शिखा की उद्योतिनी रक्षा करें और मस्तक पर स्थित उमा मेरी रक्षा करें।

२२.
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥

हिन्दी अर्थ:
ललाट की रक्षा मालाधरी करें, भौंहों की यशस्विनी, भौंहों के बीच त्रिनेत्रा और नासिका की यमघण्टा रक्षा करें।

२३.
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी॥

हिन्दी अर्थ:
आँखों के मध्य शंखिनी, दोनों कानों की द्वारवासिनी, कपोलों की कालिका और कानों के मूल की शांकरी रक्षा करें।

२४.
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥

हिन्दी अर्थ:
नासिका की सुगन्धा, ऊपरी होंठ की चर्चिका, निचले होंठ की अमृतकला और जिह्वा की सरस्वती रक्षा करें।

२५.
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥

हिन्दी अर्थ:
दाँतों की कौमारी, कण्ठ की चण्डिका, कण्ठ की घंटिका की चित्रघण्टा और तालु की महामाया रक्षा करें।

शरीर के अंगों की रक्षा

२६.
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥

हिन्दी अर्थ:
चिबुक की कामाक्षी, मेरी वाणी की सर्वमंगला, ग्रीवा की भद्रकाली और मेरुदण्ड की धनुर्धरी रक्षा करें।

२७.
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी॥

हिन्दी अर्थ:
बाहरी कण्ठ की नीलग्रीवा, कण्ठ की नलिका की नलकूबरी, दोनों कंधों की खड्गिनी और मेरी भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें।

२८.
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥

हिन्दी अर्थ:
हाथों की दण्डिनी, उँगलियों की अम्बिका, नाखूनों की शूलेश्वरी और उदर-पार्श्व की कुलेश्वरी रक्षा करें।

२९.
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥

हिन्दी अर्थ:
स्तनों की महादेवी और मन के शोक को नष्ट करने वाली देवी रक्षा करें। हृदय की ललिता देवी और उदर की शूलधारिणी रक्षा करें।

३०.
नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥

हिन्दी अर्थ:
नाभि की कामिनी, गुप्त अंगों की गुह्येश्वरी, जननेंद्रिय की पूतना/कामिका और गुदा की महिषवाहिनी रक्षा करें।

३१.
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥

हिन्दी अर्थ:
कमर की भगवती, घुटनों की विन्ध्यवासिनी और पिंडलियों की महाबला रक्षा करें; सर्वकामना प्रदान करने वाली देवी भी रक्षा करें।

३२.
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥

हिन्दी अर्थ:
दोनों टखनों की नारसिंही, पैरों के ऊपरी भाग की तैजसी, पैर की उँगलियों की श्री और तलवों की अधस्तलवासिनी रक्षा करें।

३३.
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥

हिन्दी अर्थ:
नाखूनों की दंष्ट्राकराली, बालों की ऊर्ध्वकेशिनी, रोमकूपों की कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी रक्षा करें।

३४.
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥

हिन्दी अर्थ:
रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि और मेद की पार्वती रक्षा करें। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करें।

३५.
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥

हिन्दी अर्थ:
हृदय के पद्मकोश की पद्मावती, कफ की चूडामणि, नाखूनों की ज्वाला की ज्वालामुखी और सभी संधियों की अभेद्या देवी रक्षा करें।

३६.
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥

हिन्दी अर्थ:
शुक्र धातु की ब्रह्माणी, छाया की छत्रेश्वरी और मेरे अहंकार, मन तथा बुद्धि की धर्मधारिणी रक्षा करें।

३७.
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥

हिन्दी अर्थ:
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान— इन जीवनवायुओं की वज्रहस्ता रक्षा करें और कल्याणमयी देवी मेरे प्राणों की रक्षा करें।

३८.
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥

हिन्दी अर्थ:
रस, रूप, गंध, शब्द और स्पर्श की योगिनी रक्षा करें। सत्त्व, रज और तम— इन तीनों गुणों की नारायणी सदा रक्षा करें।

३९.
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥

हिन्दी अर्थ:
आयु की रक्षा वाराही करें और धर्म की वैष्णवी। यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की चक्रिणी रक्षा करें।

४०.
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥

हिन्दी अर्थ:
मेरे गोत्र की इन्द्राणी रक्षा करें और हे चण्डिके! मेरे पशुधन की रक्षा करें। मेरी संतान की महालक्ष्मी और पत्नी की भैरवी रक्षा करें।

४१.
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥

हिन्दी अर्थ:
मेरे मार्ग की सुपथा देवी रक्षा करें और यात्रा के पथ की क्षेमकरी रक्षा करें। राजद्वार अथवा महत्वपूर्ण स्थानों पर महालक्ष्मी तथा चारों ओर विजया मेरी रक्षा करें।

४२.
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥

हिन्दी अर्थ:
हे देवी जयन्ती, पापों का नाश करने वाली माता! शरीर अथवा जीवन में जो भी स्थान इस कवच से छूट गया हो और जिसकी रक्षा नहीं हो पाई हो, उन सभी की आप रक्षा करें।

कवच के फल का वर्णन

४३.
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥

हिन्दी अर्थ:
जो अपने लिए शुभ फल चाहता है, उसे कवच से सुरक्षित हुए बिना एक कदम भी नहीं बढ़ना चाहिए। जो व्यक्ति इस कवच से सदा आवृत होकर जहाँ भी जाता है—

४४.
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥

हिन्दी अर्थ:
उसे वहाँ अर्थ अर्थात् समृद्धि और विजय प्राप्त होती है। वह जिस इच्छा का चिंतन करता है, उसे प्राप्त करता है और पृथ्वी पर अतुलनीय ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

४५.
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥

हिन्दी अर्थ:
कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय होता है और संघर्षों में पराजित नहीं होता। ऐसा व्यक्ति तीनों लोकों में सम्मान के योग्य माना जाता है।

४६.
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥

हिन्दी अर्थ:
देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ कहा गया है। जो व्यक्ति शुद्ध भाव से श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है—

४७.
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥

हिन्दी अर्थ:
उसमें दैवी शक्ति का विकास होता है और वह तीनों लोकों में अपराजित रहता है। वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है और अकाल मृत्यु से सुरक्षित रहता है— ऐसा इस स्तोत्र में फलश्रुति के रूप में कहा गया है।

४८.
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥

हिन्दी अर्थ:
सभी प्रकार के रोग तथा लूता, विस्फोटक आदि कष्ट नष्ट होते हैं। स्थावर, जंगम अथवा कृत्रिम— किसी भी प्रकार के विष का प्रभाव दूर होने की बात कही गई है।

४९.
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चौपदेशिकाः॥

हिन्दी अर्थ:
भूमि पर किए गए अभिचार, मंत्र और यंत्र तथा पृथ्वी पर, आकाश में अथवा जल में विचरण करने वाली नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है— ऐसा कवच की फलश्रुति में वर्णित है।

५०.
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥

हिन्दी अर्थ:
सहजा, कुलजा, माला, डाकिनी, शाकिनी तथा आकाश में विचरण करने वाली भयंकर और शक्तिशाली डाकिनियों आदि से भी रक्षा होने का वर्णन है।

५१.
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कुष्माण्डा भैरवादयः॥

हिन्दी अर्थ:
ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि से भी रक्षा होने की फलश्रुति कही गई है।

५२.
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥

हिन्दी अर्थ:
जब यह कवच हृदय में स्थित रहता है, तो उसके प्रभाव से उपर्युक्त बाधाएँ नष्ट होती हैं। राजा अथवा शासक के सम्मान में वृद्धि और तेज की विशेष वृद्धि होती है।

५३.
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥

हिन्दी अर्थ:
मनुष्य यश में बढ़ता है और पृथ्वी पर कीर्ति से सुशोभित होता है। पहले कवच का पाठ करके चण्डी सप्तशती का जप करना चाहिए।

५४.
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥

हिन्दी अर्थ:
जब तक पर्वतों और वनों सहित यह पृथ्वी बनी रहती है, तब तक पृथ्वी पर उसकी पुत्र-पौत्र आदि की संतति बनी रहने की फलश्रुति कही गई है।

५५.
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः॥

हिन्दी अर्थ:
देह का अंत होने पर महामाया की कृपा से साधक उस परम स्थान को प्राप्त करता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ कहा गया है।

५६.
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ ॐ ॥

हिन्दी अर्थ:
वह परम स्वरूप को प्राप्त करता है और भगवान शिव के साथ परम आनंद का अनुभव करता है। ॐ।

यहाँ पढ़े: 

मां दुर्गा जी की आरती | श्री दुर्गा चालीसा | देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् | श्री भगवती स्तोत्रम् | श्री नवदुर्गा स्तोत्र अवं स्तुति | मां दुर्गा के 108 नाम