वेदसार शिव स्तव (Vedsar Shiv Stav) – संपूर्ण लिरिक्स, महत्व और लाभ
वेदसार शिव स्तव ( Vedsar Shiv Stav ) भगवान शिव की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है। इसमें महादेव के स्वरूप, उनकी अनंत शक्ति, करुणा और संपूर्ण सृष्टि के आधार रूप का सुंदर वर्णन मिलता है। शिव भक्त इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धा और भक्ति के साथ करते हैं तथा भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
यह स्तोत्र भगवान शिव को सृष्टि के आदि और अनादि स्वरूप, परम ब्रह्म तथा समस्त जगत के पालनकर्ता के रूप में नमन करता है। नियमित रूप से इसका पाठ करने से मन में शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है।
वेदसार शिव स्तव का महत्व
सनातन परंपरा में वेदसार शिव स्तव का विशेष स्थान माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के दिव्य स्वरूप का स्मरण कराता है और भक्त के मन में भक्ति, श्रद्धा तथा आत्मविश्वास को मजबूत करता है।
श्रावण मास, सोमवार, महाशिवरात्रि तथा अन्य शिव पूजन के अवसरों पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है। कई श्रद्धालु अपनी दैनिक पूजा में भी इस स्तोत्र को शामिल करते हैं।
वेदसार शिव स्तव के लाभ
वेदसार शिव स्तव का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान शिव के प्रति भक्ति और श्रद्धा दृढ़ होती है। नियमित पाठ से मन को शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है तथा साधक का मन भगवान शिव के दिव्य स्वरूप में एकाग्र होकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।
|| वेदसार शिव स्तव ||
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।1।
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।2।
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।3।
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।4।
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।5।
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।6।
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।7।
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।8।
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।9।
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।10।
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।11।
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